Posted by [email protected] on October 18, 2014 at 2:35 AM
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हम मुतमईन थे के कई हमारे बैठे हैं।
क्या खबर थी ये मेरे ही सहारे बैठे हैं।
दर्द से इजतेराब हो हाथ बढ़ाया हमने
थामने वाले खुद आँख मींचे बैठे हैं।
कुर्बते हमसफर की इंटेहान तो देखिये
कितने ही फासले खुद मे समेटे बैठे हैं।
Oops!
Oops, you forgot something.