Posted by [email protected] on January 13, 2015 at 3:45 AM
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क्यूँ कर इंसान इतना ग़ुरूर करता है
अपनी हैसियत से ऊँचा अपना क़द करता है
क्यूँ कर गुमान की उड़ान भरता है
बिन पंख का परवाज़ औंधे मुँह गिरता है
क्यूँ कर असलियत से ऑंख फेरता है
ये ग़लतफ़हमी ज़िंदगी को फ़ना करता है
क्यूँ कर वो औक़ात में नहीं रह पाता है
सँभल जा अहमक के वक़्त पल में बदल जाता है
Oops!
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