Posted by [email protected] on April 20, 2015 at 6:10 AM
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इफराते हादसों की फरियाद खूब है
बाहम दुआ करता नहीं कोई
गिरदाब के मारो की आह-ओ-बुका बहुत है
किनारे से हाथ बढ़ाता नहीं कोई
अहले महफिल मे खैर-ख़्वाह कई हैं
झूठे मुंह तसल्ली देता नहीं कोई
जख्म-ओ-मजरूह की हाय-हाय बेश है
बहरहाल मलहम लगाता नहीं कोई॰
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