Posted by [email protected] on July 24, 2015 at 4:55 AM
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नाराजगी ही सही जताते तो हैं
अपने कुछ वक़्त निकालते तो हैं।
दानिस्ता ही सही सताते तो हैं,
ये हादसे कुछ वक़्त निकालते तो हैं।
रूठ के ही सही बिताते तो हैं,
ये लम्हे कुछ वक़्त निकालते तो हैं।
दबे पाँव ही सही छलक़ते तो हैं,
गम ए अश्क कुछ वक़्त निकालते तो हैं।
बेमानी ही सही बसते तो हैं,
ये सपने कुछ वक़्त निकालते तो हैं।
Oops!
Oops, you forgot something.