Posted by [email protected] on March 8, 2016 at 4:45 AM
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प्रिया भगिनी पुत्री बनकर
निष्ठा से निर्वाह किया
सिरजनहार हम नतमस्तक हैं
जननी का सौभाग्य दिया
विचर रहे व्रक भेस बदलकर
छल बल और अहंकार दिया
अपना रूप दिया मानुष को
काहे ना संस्कार दिया
हर जुग परखा नाम पलटकर
कभी द्रौपदी कभी सिया
तार दे जो नारी जीवन को
अवतार ऐसा, अभी, नहीं लिया
Oops!
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